हाल-बेहाल बाजार-ऐ-दिल्ली

दिल्ली में पैदल चलने की आदत बनी रहती है, भला हो हमारे बाज़ारों का पांच मिनट का रास्ता आधा घण्टे में तय करने का मौका मिल जाता है। अगर आप दिल्ली से बाहर चलें जाएं तो भीड़भाड़ की आदत के कारण दिल लगता ही नहीं, ना दुकानों की चकाचैंध, ना हॉकर्स की चिल्ल-पौं...

बोर होने से बचाने का पूरा इंतज़ाम होता है, यहाँ सामान बेचने के लिए हसीन सी आवाज़ें निकाल-निकाल कर राहगीरों का मनोरंजन किया जाता है!  
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छूटना नहीं चाहिए निर्भया का गुनहगार

मानता हूँ कि कुछ चीज़ें संवैधानिक मज़बूरी में करनी पड़ती हैं, जैसे कि निर्भया केस में जघन्यय अपराध करने के बावजूद नाबालिग लड़के को अदालत ने फांसी देने अथवा जेल भेजने की जगह 3 साल के लिए बाल सुधर गृह में भेजा। जहाँ किसी मेहमान की तरह उसकी शिक्षा, खान-पान और सुरक्षा पर हज़ारों-लाखों रूपये का खर्च हुए। उसे काम सिखाया गया, लिखना-पढ़ना सिखाया गया, काउंसलिंग की गई और इसी तरह बाहर आने पर कारोबार के लिए 10 हज़ार रूपये और सिलाई मशीन दी जा रही है।

परन्तु यह बेहद ही दुःख और अफ़सोस की बात है कि उसे यह सब केवल बालिग़ होने से चंद महीने छोटा होने पर मिल गया, जबकि होना यह चाहिए कि किसी अपराधी की उम्र की जगह उसके अपराध की भयावहता को देखते हुए नाबालिग होने ना होने का फैसला लिया जाए। जो व्यक्ति क्रूर तरीके से बलात्कार कर सकता है, क्रूरता की इस हद तक जा सकता है कि लड़की की दर्दनाक मौत हो जाती है, वह हरगिज़-हरगिज़ नाबालिग नहीं हो सकता। फिर चाहे कानून में फेरबदल ही क्यों ना करना पड़े, पर ऐसे लोगों को यूँ खुला छोड़ने की जगह बालिगों की तरह ही सख्त से सख्त सज़ा मिलनी चाहिए। ऐसे लोग किसी एक के नहीं बल्कि पूरी इंसानियत के गुनहगार हैं!

प्रदुषण के ख़तरे पर सम-विषम फार्मूला और हमारी ज़िम्मेदारी

दिल्ली सरकार ने गाड़ियों को चलाने का सम-विषम फार्मूला सामने रखा, हो सकता है नाकामयाब रहे और यह भी हो सकता है कि कामयाब हो जाए... मगर हम लोग विषय की गंभीरता को समझने और कार पूल, सार्वजानिक परिवहन या इलेक्ट्रिक  इस्तेमाल करने की बात करने की जगह चुटकुले बना रहे हैं, कानून का तोड़ बताते फिर रहे हैं... जैसे कि प्रदूषण का नुकसान केवल केजरीवाल के बच्चों को ही होने वाला हो तथा हम और हमारे बच्चे सुरक्षित हों!

अगर वाकई ऐसा है तो फिर करते रहिये जो 'जी' चाहे, नहीं तो फिर प्रदुषण को रोकने की अपनी तरफ से भी पूरी कोशिश करिये, वर्ना आने वाली पीढ़ी हमें माफ़ नहीं करेगी!

हालाँकि यह भी सत्य है कि केवल इसी फॉर्मूले से हल नहीं निकलेगा, कुछ और फैसले भी लेने पड़ेंगे जैसा कि दिल्ली सरकार ने 4-5 महीने पहले अनाउंस किया था कि दिल्ली में एक परिवार को एक ही गाडी की इजाज़त मिलेगी और पहले ही गाडी की पार्किंग की जगह भी बतानी पड़ेगी, वर्ना गाडी नहीं खरीद पाएंगे।

कुछ लोग कह रहे हैं कि कहना आसान है, हालाँकि यह बात सही भी है कि कहना आसान है, कहना वाकई आसान होता है और करना मुश्किल! मगर अब पानी सर से ऊपर गुज़र चुका है बल्कि काफी पहले ही गुज़र चूका है, पर कम से कम आज तो ज़रूरत हर मुश्किल काम को अमल में लाने की है.... अगर खुदा ना खास्ता कोई एक प्रयोग फेल होता है तो कई और करने पड़ेंगे, लेकिन अगर आने वाली जेनरेशन को बचाना है तो मुश्किल फैसले करने ही पड़ेंगे, केवल सरकार को ही नहीं बल्कि हमें भी... हमारे भी फ्यूचर का उतना ही सवाल है।

कई लोगों को इस फॉर्मूले के नाकामयाब रहने का भी डर सता रहा है, क्योंकि उन्हें लगता है कि देश की जनता को कानून का डर नहीं होता, प्रदुषण से होने वाले नुकसान की चिंता नहीं है और यह भी कि हम लोग अपना आराम नहीं छोड़ना चाहते हैं... और समाज को देखकर काफी हद तक उनका तर्क भी सही लगता है, मगर यह सोचकर हाथ पर हाथ धार कर नहीं बैठा जा सकता है!

दिल्ली सरकार ने ‪#‎EvenOddFormula‬‬ के साथ-साथ कुछ और भी कदम उठाएं हैं जैसा कि सड़कों पर धूल को साफ़ करके साइड करने की जगह वेक्यूम क्लीनिंग की योजना है कमर्शियल गाडियो का एंट्री टाइम 9 बजे की जगह को रात 11 बजे किया गया है, क्योंकि उस समय तक दिल्ली में पहले ही काफी ट्रैफिक रहता है, साथ में कमर्शियल व्हीकल्स के आ जाने से स्थिति और भी खराब हो जाती हैज्ञात रहे कि ट्रेफिक जाम भी प्रदुषण का बड़ा कारण होता है। 

दिल्ली के दो पॉवर प्लांट्स बंद किये जा रहे हैं, जिनका उत्पाद कम हैं और उनपर निर्भरता भी कम हैं। प्रदुषण सर्टिफिकेट सेंट्रलाइज किये गए हैं, अर्थात अब प्रदुषण सर्टिफिकेट तब ही मिलेगा जबकि गाडी का प्रदूषण निर्धारित मानको से कम होगा, क्योंकि वाहन की जानकारी केवल जाँच पॉइंट पर ही नहीं बल्कि सेन्ट्रल पॉइंट तक भी आटोमेटिक पहुँच जाएगी। 10 साल से पुरानी डीज़ल गाडियो को बंद किया जा रहा है, क्योंकि प्रदूषण में इनका भी योगदान काफी हैं। साथ ही खुले में कूड़ा जलाने पर लगे प्रतिबंध को और सख्त बनाया जा रहा हैं

हालाँकि डीज़ल गाड़ियों के नए रजिस्ट्रेशन पर बैन जैसे कदम भी उठाए जा रहे हैं पर इसके साथ-साथ डीज़ल से चलने वाले कमर्शियल व्हीकल्स पर लगाम लगनी चाहिए और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को और ज़्यादा प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए


शे`र: रूठते हैं कभी मान जाते हैं....

रूठते हैं कभी मान जाते हैं
कुछ ऐसे बेक़रार करते हैं

जो बोलना है, बोलते ही नहीं
वैसे बाते हज़ार करते है

- शाहनवाज़ 'साहिल'




फ़िलबदीह मुशायरा - 022 में आदित्य आर्य जी के मिसरे 'प्यार जो बेशुमार करते है' पर मेरे दो शे`र

अपने विचार थोपने और ख़ुद सज़ा देने वाली सोच का विरोध करिये

अपनी सोच दूसरों पर थोपने और ख़ुद से सज़ा देने की सोच गुंडागर्दी है और इसका जमकर विरोध किया जाना चाहिए।

देश, पंथ या फिर धर्म इत्यादि में दिखावे की जगह दिल से मुहब्बत का जज़्बा होना चाहिए, दिखावा आम होने से लोग दूसरों पर अपनी राय को ज़बरदस्ती थोपने लगते हैं। इमोशनल ब्लैकमेल करके लोगों को इकठ्ठा करते हैं और फिर अपनी राय से अलग राय रखने वालों पर इसी तरह धावा बोलते हैं जैसे प्रोफ़ेसर कुलबर्गी या फिर दादरी के अख़लाक़ पर बोला गया था। मुंबई में सिनेमा में राष्ट्रिय गान बजते समय खड़े ना होने वाले परिवार को बेइज़्ज़त करने वाले मामले  को भी इसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

जबकि इन तीनों या इन जैसे सभी मामलों में होना यह चाहिए था कि अगर कहीं पर कोई कुछ गलत कर भी रहा है तो कानून को अपने हाथ में लेने की जगह, कानून का सहारा लिया जाना चाहिए, पुलिस को सूचित करना चाहिए।

हमें अपनी सोच के विरुद्ध सोचने वालों के प्रति इन्साफ का रवैया अपनाने की ज़रूरत है, कानून और नैतिकता के दायरे में रहते हुए हर किसी को अपना मत ज़ाहिर करने, अपनी राय के मुताबिक़ ज़िन्दगी जीने का हक़ है और होना भी चाहिए। पर लोकतंत्र में अपनी राय को हर हाल में लागू करने वाली सोच का विरोध होना चाहिए। ऐसी सोच फासिस्ट अथवा तानाशाही विचारधारा से उत्पन्न होती है और सभ्य समाज में फासिज़्म अथवा तानाशाही को हरगिज़ स्थान नहीं मिलना चाहिए।