'इस्लाम' किसी 'नाइंसाफी' को जायज़ नहीं ठहराता

इस्लाम में 'इंसाफ' बेहद अहम है, बल्कि इस्लामिक स्कॉलर्स मानते हैं कि रूह की तरह है, मतलब अगर 'इस्लाम' का कोई और नाम हो सकता है तो वोह 'इंसाफ' है। इसमें किसी भी तरह की छोटी सी भी 'नाइंसाफी' को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। जो लोग इस्लामिक बातों को तोड़-मरोड़ कर ऐसा करने की कोशिश करते हैं, दर-असल वोह कहीं ना कहीं आतंकी प्रोपेगेंडा का हिस्सा या फिर शिकार हैं। आज का समय खासतौर पर मुस्लिम जगत के लिए बेहद Crucial (महत्वपूर्ण) है, सतर्क रहने की ज़रूरत है। इसलिए जहाँ भी आपको लगे कि इस्लामिक बातों से किसी 'नाइंसाफी' को जस्टिफाई करने की कोशिश हो रही है तो उसे हरगिज़ सच नहीं माने और खूब अच्छी तरह तस्दीक़ करें।
हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि इस्लाम किसी क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरुप स्वयं 'सज़ा' देने की बात नहीं करता, मसलन अगर किसी को पता चले कि किसी व्यक्ति ने उसके परिवार वालों को मौत के घात उतार दिया तो वोह प्रतिक्रिया स्वरुप उसके परिवार को मार डाले। बल्कि इस्लाम में 'न्याय' का एक प्रोसेस बनाया गया है, अर्थात किसी का जुर्म साबित होने के बाद ही उसे सज़ा दी जा सकती है और सज़ा केवल प्रशासन के द्वारा ही दी जा सकती है!
#IslamAgainstTerrorism
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