राजनीति में भी चलती है बाबागिरी

देश के लोगों को वैसे भी हर फिल्ड में इन ढोंगी बाबाओ का तरीक़ा ही पसंद आता है। हम हमेशा शाही अंदाज़ में रहने और कभी ना पुरे होने वाले सपने दिखाने वाले नेताओं को ही पसंद करते आए हैं। 

यह सारा खेल परसेप्शन्स का है, जिसके ज़रिये दिव्य अथवा मसीहा की छवि गढ़ी जाती है और अलौकिक सपने दिखाए जाते हैं। लोगों के मन में अगर एक बार किसी के लिए उद्धार करने वाले मसीहा की धारणा उत्पन्न हो गई तो फिर वोह चाहे कुछ भी करता रहे।

उनकी अंधभक्ति में हम ऐसे लीन हो जाते हैं कि उनके खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को सुनना या पुख्ता सबूतों के मिलने पर भी हकीक़त को क़ुबूल करना तो छोड़ो, उनपर अपनी जान तक न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं।

सादगी से रहने वालों में हमें स्टारडम नज़र नहीं आता, काम करने वाले इक्का दुक्का लोग राजनीति में आते भी हैं तो वोह किसे पसंद आते हैं?

काश ऐसा हो!


जिस तरह ओखला की मस्जिद में सूअर का गोश्त मिलने पर मुसलमान नहीं भड़के और फ़ौरन पुलिस को फोन किया, क्या मैं यह उम्मीद कर सकता हूँ कि बाकी जगह के मुसलमान भी ऐसा ही करेंगे?

और ठीक इसी तरह मंदिर में मांस मिलने जैसी घिनौनी हरकत पर हिन्दू भी ऐसा ही करेंगे?

अगर जवाब 'हाँ' है तो समझ लीजिये कि नफ़रत फ़ैलाने की कोशिशें हार जाएंगी, वर्ना मासूम दंगो की भेट चढ़ते रहेंगे और नफ़रत की राजनीति करने वाले अपने मक़सद में कामयाब होते रहेंगे!



साम्प्रदायिकता से निपटने में ओखला के लोगो ने मिसाल कायम की

ओखला के लोगो को सलाम करना चाहूंगा कि जिस तरह मदनपुर खादर स्थित मस्जिद में  मरा हुआ सूअर पाए जाने के बाद उन लोगो ने नफरत की राजनीति के मक़सद को समझकर, तनाव फैलाने की जगह पुलिस को इन्फॉर्म किया, वह काबिले तारीफ है।

 (Image Source: Indian Express)
मौके पर पहुंचे 'आम आदमी पार्टी' के नेता अमानउल्ला खान के द्वारा फ़ौरन इस मामले की जानकारी पुलिस को दी गई. उनका कहना है कि "कुछ अनजान लोग लगातार इस इलाके में तनाव फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, मस्जिद में जो कुछ हुआ वह इसी की एक कड़ी है।"

काश त्रिलोकपुरी जैसी अन्य जगहों पर भी स्थानीय निवासियों ने ऐसा ही किया होता तो दिल्ली दंगो के दाग से शर्मसार नहीं होती... ऐसी साज़िशों से निपटने के लिए लोगो को सजग रहने और सही कदम उठाने की ज़रूरत है, ख़ासतौर पर चुनाव के समय! हमें समझना होगा कि जो राजनैतिक पार्टिया चंद वोटों की खातिर हमें लडवाती हैं, वोह खुद तो चुनाव के बाद अपना काम निकलने पर अलग हो जाती हैं, लेकिन इस नफरत को भुगतना आम जनता को ही पड़ता है!


और सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर कब तक आम जनता इन नेताओं के झांसे में आती रहेगी?

रब की ताकत और उसका निज़ाम

एक रब की ताकत है और एक उसका निज़ाम है, ताकत यह यह है कि वह जो चाहता है वो हो जाता है (कुन-फया कुन)। और निज़ाम यह है कि बच्चा पैदा होने के लिए महिला-पुरुष का सम्बन्ध और तक़रीबन 9 महीने का वक़्त ज़रूरी है।

हालाँकि वह खुद उस निज़ाम पर पाबन्द नहीं है और इंसानो को यह दर्शाने के लिए अक्सर वह निज़ाम से इतर चीज़ें दुनिया में दिखाता रहता है, जैसे कि उसने आदम (अ.) को बिना माँ-बाप और ईसा मसीह (अ.) को बिना बाप के पैदा किया।

ठीक इसी तरह हर इक काम उसके हुक्म से होता है यह उसकी ताकत है और हमसे सम्बंधित काम हमारी मर्ज़ी और कोशिश के एतबार से ही अंजाम दिए जाते हैं यह उसका निज़ाम है! जिससे कि हमारे कर्मों का हमसे हिसाब लिया सके।