इस्लाम के नाम पर फैलाए जा रहे आतंक के खात्मे की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी मुसलामानों की ही है

उफ्फ्फ्फ़ कैसे हैवान हैं यह, जो बच्चों तक पर तरस नहीं खाते... यह लोग इंसानियत पर धब्बा हैं, आज दुनिया के सभी मुसलमानो को एक होकर इन हैवानों के खिलाफ उठ खड़े होने की ज़रूरत हैं! मुसलमानों पर ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी इसलिए भी है क्योकि यह लोग इस्लाम का नाम लेकर ऐसी हैवानियत फैलाते हैं... बेशक यह दुनिया के हर अमन पसंद का काम है कि दुनिया से हर मासूम पर ज़ुल्म करने वाले आतंकी का सफ़ाया हो!

हालाँकि दुनिया में अनेकों तरह की आतंकवादी हरकतें चल रही हैं, पर अगर बात इस्लाम के नाम पर फैलाए जा रहे आतंक की करूँ तो इसे समाप्त करने के लिए पहल ख़ुद मुसलमानों को ही करनी पड़ेगी...

मैं यह हरगिज़ नहीं मानता कि ऐसी कोई भी हरक़त कोई मुसलमान कर सकता है, और असल बात यह है कि ऐसी हरकतें तो कोई इंसान कर ही नहीं सकता है! इंसानियत मर गई है इन लोगों के अंदर से, आज इस्लाम को इन लोगों की हैवानियत से महफूज़ करने की ईमानदार मेहनत की ज़रूरत है...

अल्लाह हम सब की हिफाज़त फरमाए, पूरी दुनिया के इंसानो की!

इबादत का मतलब है 'हक़ अदा करना'

इबादत या पूजा का असल मतलब है 'हक़ अदा करना' और हमारे रब ने हम पर दो तरह के हक़ रखें हैं, एक खुद उसके जैसे कि नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात इत्यादि और दूसरे बाकियों के हम पर हक़ हैं जैसे माँ-बाप, भाई-बहन, पत्नी-बच्चों के हक़, उसके बाद रिश्तेदारों, पडौसियों, यतीमों, गरीबों, मजबूरों, भूखे-प्यासों के, सड़क पर चलने वालों के हक़... इसी तरह परिंदों, जानवरों के भी हुकूक हैं, यहाँ तक कि हमारे शरीर के अंगों के भी हम पर हुकूक हैं, जैसे हमारे शरीर / सेहत / जीवन की हिफाज़त, नज़रों की परहेज़गारी, शर्मगाह की पाकीज़गी इत्यादि...

मगर हमें यह याद रखना आवश्यक है कि अल्लाह गफूरुर-रहीम है, उससे बड़ा रहम करने वाला, क्षमा करने वाला कोई और नहीं हो सकता और उसने आखिरत (परलोक) में रहम की बारिश का वादा किया है, लेकिन उसके अलावा बाकियों के हुकूक हमें अदा करने ही होंगे, उसने मुहम्मद (स) के हाथों हमें यह पैगाम भेज दिया है कि इंसान आख़िरत में किसी को अपनी एक नेकी भी नहीं देगा और अपने हर हक़ का बदला लेगा...

तो सोचिये हमें ज्यादा मेहनत कहाँ करने की ज़रूरत है?

गलती किसी की, सजा किसी को...


उबेर कैब पर बैन को लोग हास्यपद ठहरा रहे हैं, तर्क है कि किसी एक ड्राइवर की गलती का खामियाज़ा पूरी कंपनी क्यों भुगते...

कभी सोचा है कि आप ही लोग किसी एक मुस्लिम के किसी गुनाह में नाम आने भर से पूरी क़ौम को ज़िम्मेदार ठहराते हैं?


इस पोस्ट पर कुछ अच्छा विचार-विमर्श यहाँ पढ़ा जा सकता है:

ब्रेनवॉश्ड होने का मुख्य कारण है अंधविश्वास


हमारी अंधविश्वासी प्रवृति और धर्म विरुद्ध बात सुनने पर आग बबूला हो जाने वाले जूनून का फायदा शातिर लोग हमेशा से ही उठाते आए हैं, कभी दंगे करवाकर और कभी आतंक फैला कर।

हालाँकि ऐसा नहीं है कि आम लोगो का ब्रेनवॉश केवल आतंक की फैक्ट्रियां चलाने या दंगों की इबारतें लिखने के लिए ही किया जाता हो, बल्कि इसी कारणवश इंसान इस क़दर ज़ालिम बन जाता है कि मासूम बच्चों की बलि देने से भी नहीं चूकता!

और इसके पीछे की मुख्य वजह होती है धर्म का अल्प ज्ञान और बिना जाँचे-परखे आँखमूँद कर विश्वास करना यानी अंधविश्वास! इसके लिए किसी धर्म को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, मगर धर्मगुरुओं को ज़रूर ठहराया जा सकता है। अपना काम यानी सही जानकारी लोगों तक ना पहुंचा पाने जैसी वजहों से...

राजनीति में भी चलती है बाबागिरी

देश के लोगों को वैसे भी हर फिल्ड में इन ढोंगी बाबाओ का तरीक़ा ही पसंद आता है। हम हमेशा शाही अंदाज़ में रहने और कभी ना पुरे होने वाले सपने दिखाने वाले नेताओं को ही पसंद करते आए हैं। 

यह सारा खेल परसेप्शन्स का है, जिसके ज़रिये दिव्य अथवा मसीहा की छवि गढ़ी जाती है और अलौकिक सपने दिखाए जाते हैं। लोगों के मन में अगर एक बार किसी के लिए उद्धार करने वाले मसीहा की धारणा उत्पन्न हो गई तो फिर वोह चाहे कुछ भी करता रहे।

उनकी अंधभक्ति में हम ऐसे लीन हो जाते हैं कि उनके खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को सुनना या पुख्ता सबूतों के मिलने पर भी हकीक़त को क़ुबूल करना तो छोड़ो, उनपर अपनी जान तक न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं।

सादगी से रहने वालों में हमें स्टारडम नज़र नहीं आता, काम करने वाले इक्का दुक्का लोग राजनीति में आते भी हैं तो वोह किसे पसंद आते हैं?

काश ऐसा हो!


जिस तरह ओखला की मस्जिद में सूअर का गोश्त मिलने पर मुसलमान नहीं भड़के और फ़ौरन पुलिस को फोन किया, क्या मैं यह उम्मीद कर सकता हूँ कि बाकी जगह के मुसलमान भी ऐसा ही करेंगे?

और ठीक इसी तरह मंदिर में मांस मिलने जैसी घिनौनी हरकत पर हिन्दू भी ऐसा ही करेंगे?

अगर जवाब 'हाँ' है तो समझ लीजिये कि नफ़रत फ़ैलाने की कोशिशें हार जाएंगी, वर्ना मासूम दंगो की भेट चढ़ते रहेंगे और नफ़रत की राजनीति करने वाले अपने मक़सद में कामयाब होते रहेंगे!



साम्प्रदायिकता से निपटने में ओखला के लोगो ने मिसाल कायम की

ओखला के लोगो को सलाम करना चाहूंगा कि जिस तरह मदनपुर खादर स्थित मस्जिद में  मरा हुआ सूअर पाए जाने के बाद उन लोगो ने नफरत की राजनीति के मक़सद को समझकर, तनाव फैलाने की जगह पुलिस को इन्फॉर्म किया, वह काबिले तारीफ है।

 (Image Source: Indian Express)
मौके पर पहुंचे 'आम आदमी पार्टी' के नेता अमानउल्ला खान के द्वारा फ़ौरन इस मामले की जानकारी पुलिस को दी गई. उनका कहना है कि "कुछ अनजान लोग लगातार इस इलाके में तनाव फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, मस्जिद में जो कुछ हुआ वह इसी की एक कड़ी है।"

काश त्रिलोकपुरी जैसी अन्य जगहों पर भी स्थानीय निवासियों ने ऐसा ही किया होता तो दिल्ली दंगो के दाग से शर्मसार नहीं होती... ऐसी साज़िशों से निपटने के लिए लोगो को सजग रहने और सही कदम उठाने की ज़रूरत है, ख़ासतौर पर चुनाव के समय! हमें समझना होगा कि जो राजनैतिक पार्टिया चंद वोटों की खातिर हमें लडवाती हैं, वोह खुद तो चुनाव के बाद अपना काम निकलने पर अलग हो जाती हैं, लेकिन इस नफरत को भुगतना आम जनता को ही पड़ता है!


और सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर कब तक आम जनता इन नेताओं के झांसे में आती रहेगी?

रब की ताकत और उसका निज़ाम

एक रब की ताकत है और एक उसका निज़ाम है, ताकत यह यह है कि वह जो चाहता है वो हो जाता है (कुन-फया कुन)। और निज़ाम यह है कि बच्चा पैदा होने के लिए महिला-पुरुष का सम्बन्ध और तक़रीबन 9 महीने का वक़्त ज़रूरी है।

हालाँकि वह खुद उस निज़ाम पर पाबन्द नहीं है और इंसानो को यह दर्शाने के लिए अक्सर वह निज़ाम से इतर चीज़ें दुनिया में दिखाता रहता है, जैसे कि उसने आदम (अ.) को बिना माँ-बाप और ईसा मसीह (अ.) को बिना बाप के पैदा किया।

ठीक इसी तरह हर इक काम उसके हुक्म से होता है यह उसकी ताकत है और हमसे सम्बंधित काम हमारी मर्ज़ी और कोशिश के एतबार से ही अंजाम दिए जाते हैं यह उसका निज़ाम है! जिससे कि हमारे कर्मों का हमसे हिसाब लिया सके। 

शुक्रगुज़ार बंदा क्यों ना बनूँ?

ऐ मेरे रब, उन ने'एमतों के लिए भी बहुत-बहुत शुकिया, जिनको हम कभी महसूस भी नहीं कर पाते!

हमारा रब हमें रात-दिन अनेक खुशियाँ अता करता है, मगर उनसे खुश होना और शुक्रगुज़ार बनना तो दूर, अक्सर को तो हम खुशियों में शुमार भी नहीं करते हैं।


बच्चों के घर वापिस आने के ख़ुशी की अहमियत उनसे मालूम करो जिनका बच्चा सही सलामत स्कूल गया था, मगर वापिस नहीं आया... 

पेशाब आने की क़द्र उससे मालूम करिए जिसका पेशाब आना बंद हो, या फिर मुंह में थूक बनने की ख़ुशी उससे मालूम करिए जिसके मुंह में लार बनना बंद हो गई हो।

इस तरह की एक छोटी सी ख़ुशी को प्राप्त करने के लिए वह अपना सबकुछ लुटा देने को तैयार हो जाएँगे!






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एक-दूसरे की भावनाओं का ख़याल रखना हमारा फ़र्ज़ है

हम इक ऐसे समाज में रहते हैं जहां विभिन्न सोच और आस्था को मानने वाले एक साथ रहते हैं और फिर यह इंसानियत का तकाज़ा भी है कि हम एक-दूसरे की भावनाओं का ख़याल रखें
!

यह इसलिए भी ज़रूरी है कि अलग-अलग तरह के माहौल में पलने-बढ़ने के कारण हमें एक-दूसरे की मान्यताओं की समझ नहीं होती और इसी वजह से हम अक्सर दूसरों की सोच को अपने चश्में से देखने की कोशिश करते हैं।

यही कारण है कि हमें दूसरों की सोच हास्यपद / क्रूर / बेवकूफी लगती है और हम एक-दूसरे की भावनाओं का मज़ाक उड़ाने लगते हैं। यहाँ तक कि एक-दूसरे को अपशब्द कहने से भी गुरेज़ नहीं करते।

जबकि ऐसी ही स्थिति के लिए अल्लाह कुरआन में फरमाता है:

कह दीजिए "ऐ इंकार करने वालों, मैं वैसी बंदगी नहीं करूँगा जैसी तुम करते हो।
ना ही तुम वैसी बंदगी करने वाले हो जैसी मैं करता हूँ।
और ना मैं वैसी बंदगी करने वाला हूँ जैसी तुमने की है।
और ना तुम ऐसी बंदगी करने वाले हो जैसी मैं करता हूँ।

तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और मेरे लिए मेरा धर्म।
(कुरआन 109: 1-6)






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पत्रकारिता और उसका विरोध

पत्रकार कोई क्रन्तिकारी नहीं होता और ना ही उनका काम जनता की राय बनाना होता है बल्कि पत्रकारिता का मक़सद केवल जनता की राय को सामने लाना और इसी तरह किसी घटना के पीछे छुपे सच को बाहर लाना होना चाहिए।


हालाँकि इस कवायद में अक्सर तीखे सवाल किये जाते हैं, जिसमें से  बहुत सी बातें हमें पसंद आ सकती हैं और बहुत सी नापसंद। ऐसे में एक अच्छे लीडर का काम है विचलित हुए बिना धैर्य और चतुराई से जवाब देना। 

जहाँ तक आम आदमी की बात है तो उनसे केवल सम्बंधित विषय पर राय ही मांगी जा सकती है। ऐसे में किसी नेता या उसके समर्थकों के द्वारा पत्रकार की अभिव्यक्ति पर विचलित होना, गुस्सा दिखाना, साक्षात्कार को बीच में छोड़ देना या फिर कानून को अपने हाथ में लेने जैसे कृत निंदनीय हैं।

ऐसे कृत फासिस्ट मानसिकता को दर्शाते हैं, क्योंकि फ़सिज्म की पहचान ही यही है कि इसमें अपने खिलाफ उठने वाली किसी भी आवाज़ को कभी भी बर्दाश्त नहीं किया जाता।





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जयललिता पर कोर्ट का फैसला गुनाहगार नेताओं के खिलाफ फिर से उम्मीद जगा रहा है

कुछ नेता गुनाहगार होने के बावजूद जनता को मानसिक गुलाम बनाकर चुनाव जीत जाते हैं और देश के सर्वोच्य पदों तक पहुँच जाते हैं... फिर उसपर सोचते हैं कि उनका बाल भी बांका नहीं होगा, हालाँकि हमारे देश में इनका अबतक कुछ बिगड़ता भी नहीं था।


मगर कुछ दिनों से नेताओं पर आए कोर्ट के फैसले इंसाफ की उम्मीद जगा रहे हैं, जयललिता पर आया फैसला भी इसी की एक कड़ी है! अगर देश के लोग जागरूक हो जाएं तो बाकी बचे अपराधी भी अपनी सही जगह पहुँच जाएं!





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क्या पीएम की आगवानी के लिए एक भी अमेरिकी प्रतिनिधि का ना होना देश का अपमान नहीं है?

क्या यह देश का अपमान नहीं कि हमारे देश का प्रधानमंत्री अमेरिकी यात्रा पर पहुंचे तो आगवानी के लिए वहां का कोई छोटे से छोटा मंत्री भी नहीं पहुंचे, यहाँ तक कि किसी को आगवानी के लिए ऑफिशियली अपोइंट भी ना किया जाए? हमारी एम्बेसी को उन्हें रिसीव करना पड़े!


यह हाल तब है जबकि उनका वर्तमान तो क्या अगर भूतपूर्व राष्ट्राध्यक्ष भी हमारे यहाँ आता है तो हम अपनी पलकें तक बिछा देते हैं! मेहमान नवाज़ी में कोई कसर नहीं छोड़ते।

कुछ लोगो का विचार है कि वोह यूनाइटेड नेशंस की सभा में भाग लेने गए हैं, अमेरिकी यात्रा पर नहीं। अगर इस तर्क को मान भी लिया जाए तो क्या अमेरिका की कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती? हमारे देश में सार्क देशों के सम्मलेन में आने वाले प्रतिनिधियों का भी हम ऐसे ही स्वागत करते हैं जैसे बाकी समय आए किसी प्रतिनिधि का। 

मैं बात-बात में अमेरिका की रट लगाने वालों से पूछना चाहता हूँ कि यह किस तरह का आचरण है कि कोई राष्ट्राध्यक्ष उनके देश में पधारे तो उसकी आगवानी भी ना की जाए? 

हमारे देश की विश्व में एक अहमियत है और देश का प्रधानमंत्री कोई एक व्यक्ति भर नहीं बल्कि 122 करोड़ लोगो का प्रतिनिधि होता है। फिर चाहे वह यूनाइटेड नेशंस की सभा में भाग लेने के लिए ही अमेरिका क्यों ना गए हों तब भी देश के प्रधानमंत्री को कम से कम इतना सम्मान तो मिलना ही चाहिए!





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चिड़ियाघर जैसे हादसे और जवाबदेही

एक नौजवान, शेर से अपनी जान की भीख मांगता रहा, बेहिस लोग वीडियो बनाने में मशगूल थे और सिक्योरिटी सोती रही... 15 मिनट बाद सुरक्षा कर्मियों की नींद खुली, पर अफ़सोस कि तब तक उस बेचारे के प्राण पखेरू उड़ चुके थे 

परेशानी का सबब यह एक हादसा भर नहीं है बल्कि यह भी है कि कहीं भी, किसी की भी कोई जवाबदेही तय नहीं है...

केवल कोई चिड़ियाघर ही नहीं बल्कि अगर कही भी सुरक्षा का अच्छा प्रबंध, चाकचौबंद व्यवस्था नहीं हो सकती है तो या तो उसे आम पब्लिक के लिए बंद कर देना चाहिए या फिर चेतावनी लिख देनी चाहिए कि हम असमर्थ हैं, अपनी रक्षा स्वयं करें!

देश के हर एक नागरिक का फ़र्ज़ है ना सिर्फ अपनी जान की हिफाज़त करना बल्कि देश / प्रशासन के द्वारा बनाए कानूनों / नियमों का पालन करना, हमें यह समझना होगा कि यह नियम स्वयं हमारी सुरक्षा के लिए ही बनाए जाते हैं!

हालाँकि इस सत्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि देश में हर इक का बौद्धिक स्तर इतना बेहतर नहीं होता कि नियमों के अनुसार चलें साथ ही साथ यह भी बात है कि अक्सर वोह लोग भी रोमांच / सैडनेस इत्यादि में जान जोखिम में डाल देते हैं जो नार्मल लाइफ में सजग रहते हैं।

और इसी कारण सरकार सुरक्षा के सख्त मानकों का पालन करती है, जैसे कि हेलमेट ना पहनने से ड्राइव करने वाले को खतरा होता है फिर भी लोग नहीं पहनना चाहते, मगर सरकार ने अनिवार्य कर रखा है।

इसी तरह कोई भी प्रशासन केवल यह लिखकर हाथ नहीं झाड सकते कि आगे खतरा है। बल्कि ऐसी जगहों पर कम से कम 12-15 फुट जाली होना अति-आवश्यक है, जबकि वहां 2-3 फुट की जाली ही लगी हुई है। साथ ही दुर्घटना होने की स्थिति में ट्रेंड सुरक्षा कर्मी कम से कम ऐसे स्थानों पर अवश्य मौजूद रहने चाहिए।





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पुरानी स्ट्रेटिजी है भीतरघात

'आप' को इससे भी ज़्यादा भीतरघात के लिए तैयार रहना चाहिए, यह तो किसी को बदनाम करने और उसकी मुहीम को नुक्सान पहुंचाने की सदियों पुरानी स्ट्रेटिजी है। 

मुहम्मद (स.अ.व.) के समय जब कबीले के कबीले उनके साथ आने लगे तो दुश्मनों ने स्ट्रेटिजी बनाई, वह अपने लोगो को भी उनके साथ कर देते और कुछ समय बाद वह लोग उनपर इलज़ाम लगा कर अलग हो जाते, जिससे कि उनके साथ आ चुके या आ रहे लोगो में भ्रम फ़ैल सके। मगर मुहम्मद (स.अ.व.) के आला क़िरदार और सत्य के पथ पर चलने के कारण उनके साथियों ने उनका साथ नहीं छोड़ा।