निकाह की 'हाँ'



हमारे देश के मुस्लिम समुदाय में विशेषकर उत्तर भारत में लड़कों और खासकर लड़कियों से शादी से पहले अकसर उनकी मर्ज़ी तक मालूम नही की जाती है, एक-दुसरे से मिलना या बात करना तो बहुत दूर् की बात है... रिश्ते लड़के-लड़की की पसंद की जगह माँ-बाप या रिश्तेदारों की पसंद से होते हैं. ऐसी स्थिति में निकाह के समय काज़ी के द्वारा 'हाँ' या 'ना' मालूम करने का क्या औचित्य रह जाता है???


शादी के बाद पति-पत्नी विवाह को नियति समझ कर ढोते रहते हैं और हालत से समझौता करके जीवनी चलाते है...

मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम‌) ने शादी का प्रस्ताव देने वाले को वसीयत की है कि वह उस महिला को देख ले जिसे शादी का प्रस्ताव दे रहा है। मुग़ीरा बिन शोअबा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने एक औरत को शादी का पैगाम दिया तो इस पर नबी (स.) ने फरमाया:

 
“तुम उसे देख लो क्योंकि यह इस बात के अधिक योग्य है कि तुम दोनों के बीच प्यार स्थायी बन जाये।’’
इस हदीस को तिर्मिज़ी (हदीस संख्या: 1087) ने रिवायत किया है और उसे हसन कहा है तथा नसाई (हदीस संख्या: 3235) ने रिवायत किया है।

परिस्थितियों को आत्म विश्वास से करें काबू



जब आपका मजाक उड़ाया जाता हैं तब इसको नियति ना बनने दें, बल्कि ऐसी परिस्थिति में इस चुनौती को आप अपने दृढ़ विश्वास के द्वारा और भी अधिक आसानी से अपने हित में कर सकते हैं.

मजाक उड़ाना एक नकारात्मक प्रतिक्रिया है, जिसके कारण सकारात्मक प्रवत्ति के लोग दुगने वेग से आपके पक्ष में आएँगे - Shah Nawaz

घटिया राजनीती - ऊबते लोग


दिल्ली में RaGa और मध्य प्रदेश में NaMo की रैलियों में भीड़ नदारद होने लगी है, लाखों की भीड़ का दावा करने वाले दस-बीस हज़ार लोगो को भी नहीं जुटा पा रहे हैं... यह बताता है कि जनता नेताओं से ऊब रही है... जिस तरह की राजनीती और बयानबाज़ी चल रही है, उससे देख कर यह ऊब जायज़ भी लगती है...


देश में अनेकों बार चुनाव हुए, लेकिन जिस तरह की घटिया राजनीती इस बार हो रही है, वैसी कम से कम मेरे सामने तो कभी नहीं हुई. चुनाव में जीत के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, अपशब्द बोले जा रहे हैं, दंगे करवाये जा रहे हैं, साज़िशें रची जा रही हैं, तथ्यों को तोडा-मरोड़ा ही नहीं जा रहा बल्कि सिरे से ही बदलने की कोशिशें है...

और अगर आप इनके खिलाफ कुछ बोलों तो फौजें तैयार है आपके ऊपर सायबर हमलें करने के लिए.... पता नहीं अभी २०१४ तक क्या-क्या देखने / सहने को मिलने वाला है?

ख़ुदा खैर करे!!!
 
 
(Photo courtesy: Aajtak)

सृजन एवं सर्जक


एक तरफ सारी दुनियाओं का 'रब' है जो समंदर के अंधेरों में छोटे से कोमल जीव की रक्षा के लिए भी कठोर सीपियाँ बनाता है और वोह भी ला'तादाद एवं किसी की मदद के बिना...

ऐसी सीपियाँ जो देखने में खूबसूरती का बेजोड़ नमूना होती हैं, जबकि उन्हें देखने वाला कोई 'अक्लमंद' इंसान वहां मौजूद नहीं होता।

और दूसरी तरफ इंसान है जो बिना मशीनरी और कच्चे माल के कुछ भी बनाने में असमर्थ है, मगर फिर भी अकड़ता फिरता है।

सत्य में पक्षपात कैसा?

हिन्दू की बात हो, ना कोई मुसलमान की
अब तो हर इक बात हो बस ईमान की

हिन्दू-मुसलिम की जगह सत्य की तरफदारी होनी चाहिए। अक्सर लोग ऐसा करते भी हैं, मगर कुछ लोगो को छोड़कर। जिनके लिए सही-गलत को देखने का चश्मा धार्मिक अथवा जातीय भेदभाव से प्रभावित होकर गुज़रता है। कुछ अज्ञानतावश ऐसा करते हैं तो कुछ राजनैतिक दुष्प्रचार के कारण पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर।

इस हालात से तभी निजात पाई जा सकती है, जबकि देश को धर्मों-जातियों में बाटने की राजनीति का देश से खात्मा कर दिया जाए!

 
हम शौक़ से हिन्दू या मुसलमान बनें
कुछ भी बन जाएँ मगर पहले इक इंसान बनें।

रावण-दहन ना देख पाने की मायूसी


बेटियां बहुत नाराज़ थी! बड़ी बिटिया 'ऐना' बोली कि आप अच्छे नहीं हैं, आपने promise किया था और break कर दिया!

कल दोनों बेटियों को रावण दहन दिखाने ले कर गया था, मगर कल बहुत ही व्यवस्थित कार्यक्रम था। इस बार खाली मैदान के आगे बैठने का इंतजाम किया गया था, जिसको बड़े से पांडाल से कवर किया गया था। मगर उसमें अन्दर जाने के लिए बहुत लम्बी लाइन लगी थी।

हालाँकि पीछे से वीआईपी पास से जाने का इंतजाम था, मगर मुझे वहां से अन्दर जाना घंटों से लाइन में लगी इतनी भारी भीड़ के साथ अन्याय लगा। इसलिए मैं बाहर से ही बेटियों को किसी तरह समझा-बुझा कर वापिस ले आया... मगर उनका सारा उत्साह मायूसी में तब्दील हो गया!

नेताओं की नकली धर्मनिरपेक्षता

नकली धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़कर 'धर्मनिरपेक्षता' को बदनाम करने वाली पार्टियाँ चाहे जितना मर्ज़ी धार्मिक भेदभाव फैलाएं, वोटों के लिए दंगों की साजिशों में शामिल रहें, इनकी छवि धर्मनिरपेक्ष ही रहने वाली है। 

हमारे बौद्धिक विकास के स्तर का इसी से अंदाज़ा लग जाता है। आज भी हम बड़े दुश्मन से निपटने के लिए छोटे दुश्मन का सहारा लेने वाली सोच के ग़ुलाम हैं

हुक़्म नहीं है 'फतवा'

'फतवा' केवल सवाल करने पर ही दिया जाता है और मालूम करने वाले व्यक्ति के लिए ही होता है। ज़रूरी नहीं कि वह दूसरों के लिए भी सही हो। क्योंकि फतवा विशेष परिस्थिति के अनुसार इस्लामिक उसूलों की रौशनी में दी गयी 'सलाह' या 'मार्गदर्शन' का नाम है। तथा सम्बंधित व्यक्ति उसका पालन अथवा नज़रअंदाज़ कर सकता है। यहाँ तक कि एक ही परिस्थिति पर अलग-अलग राय के अनुसार 'फतवा' भी अलग-अलग हो सकता है।

किसी भी 'फतवे' की व्याख्या के लिए मालूम किये गए प्रश्न और परिस्थितियों का गहरा अध्यन आवश्यक होता है।

अक्सर 'फतवा' को 'हुक्म' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यह सच नहीं है। हालाँकि जानकारी के अभाव में अक्सर लोग फतवे को हुक्म ही समझते हैं।



keywords: islamic fatwa is not order

क्योंकि मानसिक विक्षिप्त वोटर नहीं हैं


क्या विकास का फटा ढोल बजाने वाली सरकारों के पास सड़कों पर दर-बदर की ठोकरे खाने वाले मानसिक विक्षिप्त लोगो के लिए कोई प्लान नहीं है? उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है? उनकी मदद के लिए कोई बजट नहीं? या कोई ऐसा बिल जो मंत्रिमंडल समूह ने अप्रूव कर दिया हो या लोकसभा/राज्यसभा में हो? 

कुछ मानवीय संवेदनाएं बची हैं या बस वोटरों को ही लुभाया जाएगा? 

नहीं, बस यूँ ही मालूम कर लिया... सुना है आजकल 'भारत निर्माण' हो रहा है..

चुनावी मौसम में मासूमों की बलि

सेनाएँ तैयार हो चुकी हैं, सेनापति ताल ठोक रहे हैं... मासूम जनता की बलि चढ़ाई जा रही है... देश की फिज़ा को बदबूदार बनाए जाने की कोशिशें रंग ला रही हैं। पिद्दी से पिद्दी पार्टी का नेता भी हर हाल में प्रधानमंत्री बनना चाहता है... आखिर यह इलेक्शन होते ही क्यों हैं???

वोटों के लालची इंसानियत की लाश के चीथड़े उड़ा रहे हैं


कुछ को लग रहा है मुसलमान मारे जा रहे हैं और कुछ को लग रहा है हिन्दू... किसी का भाई दंगो का शिकार हुआ है किसी का बेटा और किसी बाप... कितनी ही औरतों की आबरू को कुचल दिया गया... मगर हर इक अपने-अपनों के गम में उबल रहा है और दूसरों की मौत पर अट्टहास कर रहा है... घिन आती है इस सोच पर!

यक़ीन मानिये इन देशद्रोही नेताओं के हाथों इंसानियत को सरे-आम क़त्ल किया जा चुका है और अब रोज़-बरोज़ इंसानियत की मृत देह चीथड़े-चीथड़े की जा रही हैं।

ख़ुदा खैर करे!!! देश में इलेक्शन आने वाला है।

कहानी हर घर की...

सास चाहती है बहु उसके 'हिसाब' से चले और बहु चाहती है कि सास उसके 'हिसाब' से!

वहीँ पिता चाहता है बेटा उसके 'हिसाब' से चलना चाहिए, मगर बेटे का 'हिसाब' कुछ दूसरा ही होता है। उधर पति चाहता है कि पत्नी पर उसका 'हिसाब' चले मगर पत्नी अपना 'हिसाब' चलाना चाहती है।

आखिर दूसरों पर अपनी सोच थोपने की जगह सब अपने-अपने 'हिसाब' से क्यों नहीं चलते?


वैसे मज़े की बात यह है कि जो दूसरों को अपने 'हिसाब' से चलाना चाहते हैं, वह खुद भी उस 'हिसाब' से नहीं चलते!!!



Juvenile Act बदलने के लिए आन्दोलन की आवश्यकता


दामिनी कांड के तथाकथित नाबालिग अभियुक्त को जो सज़ा हुई है, वोह कानून के मुताबिक तो एकदम ठीक हई है, मगर न्याय के एतबार से इस सज़ा को नहीं के बराबर ही कहा जाएगा। मुझे लगता है ध्यान और कोशिश इस सज़ा से भी अधिक ऐसे कानून को बदलने पर होनी चाहिए जिसके तहत रेप विक्टिम को पूर्ण न्याय नहीं मिल पाया। Juvenile Act को बदलने के लिए एक  बड़े सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता है।

समय रहते चेतना होगा, ना केवल बलात्कार जैसे घृणित कृत बल्कि आतंकवाद जैसे समाज के लिए खतरनाक अपराधों में भी इस तरह के कानूनों के दुरूपयोग की पूरी संभावनाएं हैं। 

ज़रा सोचिए अगर कसाब 17 वर्ष का होता तो क्या होता???

पश्चिम जगत अब उन्ही आतंकवादियो का समर्थक क्यों है?


जिन आतंकवादी संगठनों की हरक़तों के कारण पश्चिम जगत दुनिया के सारे मुसलमानों को आतंकवादी ठहराने पर तुला हुआ था, आज वही संगठन उनके लिए सीरिया में मुजाहिदीन हो गए? अब उन पर ड्रोन हमले नहीं बल्कि हथियार पहुंचाएं जा रहे हैं... आम फौजियों की तरह सैलिरी, हथियार और अन्य सुविधा मुहैय्या करवाई जा रही हैं?

और जब सारे हित साध लिए जाएँगे तो फिर से उनकी नज़र में सारे मुसलमान आतंकवादी हो जाएँ।

बंदर लडवा रहें हैं और बिल्लियाँ लड़ रही हैं और दूर बैठी बाकी बिल्लियाँ अपनी-अपनी पसंद की बिल्लीयोँ का समर्थन कर रहीं है।

बयान और बस बयान


हमारे सैनिकों को शहीद करने वाले चाहे पाकिस्तानी सैनिक थे या नहीं थे, परन्तु आये तो उसी धरती से थे। वहीँ पर खुलेआम आतंकवादियों के ट्रेनिंग शिविर भी लगते हैं, जिन्हें वहां की सरकार खुलेआम संरक्षण देती है। जब आपने इतनी जल्दी उनकी पहचान पता कर के हमपर इतना उपकार कर ही दिया है तो आपको उनके ठिकानों की भी ज़रूर जानकारी होगी ही? तो कयों नहीं नेस्तनाबूद कर देते हैं एंटनी बाबू? फिर तो पाकिस्तानी सैनिक और आतंकवादियों का पर्दा भी नहीं रहेगा!

मानता हूँ कि हमारी सेनाएँ उनकी तरह नामर्द नहीं हैं जो चुपके से वार करें, मगर कमज़ोर भी नहीं हैं जो दुश्मन को उसके घर में घुसकर सबक ना सिखा सके!

कब बनेंगे इंसान?

बटला हाउस इनकाउंटर हो या मालेगाँव ब्लास्ट, मामला चाहे इशरत जहाँ का हो या फिर साध्वी प्रज्ञा का, सबको अपने-अपने धर्म के चश्मे से देखा जाता है। मीडिया जिसके सपोर्ट में रिपोर्ट दिखाए वोह खुश दूसरों के लिए बिकाऊ मिडिया बन जाता है... कितने ही इन्सान मर गए या मार दिए गए, मगर किसी को गोधरा का ग़म है तो किसी को गुजरात दंगो का...

कब हर मामले को सभी चश्मे हटाकर इंसानियत की निगाह से देखा जाएगा? धर्मनिरपेक्षता पर लफ्फाजी और राजनीति की जगह इसकी रूह को समझने और अपनाने की ज़रुरत है... यक़ीन मानिये जब तक हम सब इसपर नही चलेंगे, देश में शांति, खुशहाली और तरक्की आ ही नहीं सकती है..

बेहतरीन इबादत

सबसे बेहतरीन इबादतों में से एक है तन्हाई में अपने ईश्वर को याद करना, जहाँ तीसरा कोई नहीं हो... जैसे कि रात के अंधेरों में उससे बातचीत करना या फिर शौच या स्नान के समय कहना कि जिस तरह शरीर की गन्दगी से मुझे पाक़ किया उसी तरह मेरे विचारों की गन्दगी को भी दूर कर दे...

पति-पत्नी: आज की ज़रूरत

हालाँकि सच यही है कि वैवाहिक रिश्ता एक-दूसरे से मुहब्बत और अपने 'हक़' की कुर्बानी पर ही टिका होता है। मगर कडुवी सच्चाई यह है कि अक्सर यह कुर्बानी लड़कियाँ ही ज्यादा देती हैं।


आज के हालातों को देखते हुए माता-पिता के द्वारा लड़कियों को बचपन से ही कम से कम इतना 'ताकतवर' और 'आत्मनिर्भर' बनाए जाने की कोशिशों की सख्त ज़रूरत है कि अगर पति 'ज़्यादती' करे तो वह उसे लात मार सके। कुर्बानियाँ देना तो बहरहाल सिखाया ही जाता है!

दिल्ली में घूमती हैवानो की भीड़

दिल्ली के बाशिंदे हैवानियत की सारी सीमाएँ रोंदते जा रहे हैं, आखिर इसका ज़िम्मेदार कौन है?  हर बलात्कारी को पता है कि वह एक ना एक दिन पकड़ा ही जाएगा, उसके बावजूद बलात्कार की घटनाएं इस कदर तेज़ी से बढ़ रही हैं।


परसों बस के अन्दर एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार किया गया, कल एक नेपाली युवती के साथ गैंग रेप और अब गांधी नगर इलाके में बच्ची से किराएदार के कई दिनों तक रेप करने का मामला सामने आ रहा है। हैरान कर देने वाली बात यह है कि अस्पताल में जिंदगी के लिए लड़ाई लड़ रही इस मासूम के पेट से डॉक्टरों को प्लास्टिक की शीशी और मोमबत्ती मिली है।
नर्सरी में पढ़ने वाली इस बच्ची को बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले युवक ने ही अगवा किया था। घरवाले बच्ची को इधर-उधर ढूंढते रहे, जबकि बच्ची उन्हीं के नीचे के कमरे में चार दिनों तक भूखी-प्यासी कैद रही। बच्ची के हाथ-पैर बांध दिए गए थे और बुरी तरह पीटा भी गया। वोह तो अचानक बच्ची के पिता को उसके रोने की आवाज़ आई, वर्ना वोह मासूम वहीँ दम तोड़ देती।

जागते रहो

मेरे द्वारा सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाने पर यह नहीं समझ लेना कि मैं कोई संत हूँ और बुराइयाँ मेरे अंदर नहीं हैं... बल्कि मेरा मानना है कि मेरे आवाज़ उठाने से सबसे पहला फायदा मुझे ही होगा... कोई माने ना माने, मेरे स्वयं के मान जाने की तो पूरी उम्मीद है ही...

जहाँ मुझे लगता है कि कोई बुराई समाज में व्याप्त है, वहां आवाज़ उठता हूँ, जिससे कि वह बुराई मेरे अन्दर से समाप्त हो जाए।

'जागते रहो' कि सदा लगाने वाले का मकसद कम-अज़-कम खुद को जगाने का तो होता ही है...


तो क्या डंडों से सफाया होगा आतंकवाद का?


हद है... सीआरपीएफ के जवानों को कश्मीर पुलिस द्वारा घाटी में बिना हथियारों के लड़ने पर मजबूर किया जा रहा है। मतलब आधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादियों से लड़ने के लिए लकड़ी का डंडा??? इससे वह खुद की सुरक्षा करेंगे या आम जनता की?


 
इससे अच्छा तो यह है कि सीआरपीएफ की ज़िम्मेदारी कश्मीर पुलिस को ही दे दो, खुद ही भिड़ें आतंकवादियों से और वह भी लकड़ी डंडों के साथ!

ईनाम की इच्छा


स्वर्ग तो अच्छे कर्म करने वालों के लिए रब की तरफ से ईनाम है और ईनाम की लालसा में अच्छे कर्म करने वाला श्रेष्ठ कैसे हुआ भला? हालाँकि फायदे या नुक्सान की सम्भावना आमतौर पर मनुष्य को कार्य करने के लिए  प्रोत्साहित अथवा हतोत्साहित करती ही हैं।


लेकिन मेरी नज़र में तो बुरे कर्म से अपने रब की नाराजगी का डर और अच्छे कर्म से अपने रब के प्यार की ख़ुशी ही सब कुछ है।

मैं अपने पैदा करने वाले और मेरे लिए यह दुनिया-जहान की अरबों-खरबों चीज़ें बनाने वाले का शुक्रगुज़ार ही नहीं बल्कि आशिक़ हूँ, फिर जिससे इश्क होता है उसकी रज़ा में लुत्फ़ और नाराज़गी ही से दुःख होना स्वाभाविक ही है।

और मेरे नज़दीक आशिक के लिए माशूक़ से मिलने से बड़ा कोई और ईनाम क्या हो सकता है?

ज़ालिम का विरोध और मजलूम का समर्थन


अगर परिवर्तन चाहते है तो गलत को गलत कहने का साहस जुटाना ही पड़ेगा, ज़ालिम का विरोध और मजलूम का समर्थन हर हाल में करना पड़ेगा। 

और ऐसा तभी संभव है जबकि तेरा-मेरा छोड़कर इंसानियत के खिलाफ उठने वाले हर कदम का विरोध हो। जैसा कि अजमेर शरीफ दरगाह की कमिटी ने हमारे सेनिकों की बेहुरमती के विरोध में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की यात्रा का बहिष्कार करने का फैसला किया।

यह तेरा घर, यह मेरा घर?

आखिर यह रीत किसने बनाई कि पत्नी ही शादी के बाद अपना घर छोड़ कर ससुराल जाए, इक्का-दुक्का जगह पति भी जाते हैं पत्नी के घर। मगर यह रीत क्यों? पति-पत्नी मिलकर घर क्यों नहीं बनाते हैं?

जहाँ उन दोनों को और उन दोनों के परिवार वालों को एक सा सम्मान, एक सा प्यार और एक से अधिकार मिले।

धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता


धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता के एक साथ चलने में कोई भी परेशानी नहीं है लेकिन धर्मान्धता और धर्मनिरपेक्षता का एक साथ चलना मुश्किल है। 

मेरी नज़र में धर्मनिरपेक्षता का मतलब है किसी के धर्म पर नज़र डाले बिना सबके लिए समानता और हर धर्म का आदर। हालाँकि धर्मनिरपेक्षता का मतलब मेरे लिए हर एक धर्म में समानता नहीं है। 

मैं जिस धर्म को सही मानता हूँ उस पर चलूँगा और आपको हक़ है अपनी सोच के अनुसार अपने धर्म को सही मानने का, इसमें झगडे वाली बात क्या हो सकती है भला? झगडा तो तब है जबकि मैं यह सोचूं कि मेरी ही चलेगी क्योंकि मैं सही हूँ। मेरी बात मानो, नहीं तो तुम्हे इस दुनिया में रहने का हक़ नहीं है। या फिर दूसरों के धर्म या आस्था का मज़ाक बनाता फिरूं। ऐसी सोच वाले मेरी नज़र में धार्मिक नहीं बल्कि धर्मांध हैं और मैं हर एक ऐसे शख्स के खिलाफ हूँ जो ऐसा करता है या सोचता है।

यह तो रब के कानून की अवहेलना है, जिसने दुनिया में सबको अपनी मर्ज़ी से जिंदगी गुज़ारने का हक़ दिया है।

तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और मेरे लिए मेरा धर्म - [109:6] कुरआन