पुरुषों में 'विशेष' होने का अहम्



अगर हम बचपन से बेटों को विशेष होने और लड़कियों को कमतर होने का अहसास कराना बंद कर दें तो स्थिति काफी हद तक सुधर सकती है... क्योंकि इसी अहसास के साथ जब वह बाहर निकलते हैं तो लड़कियों को मसल देने में मर्दानगी समझते हैं... उनकी नज़रों में लड़कियां 'वस्तु' भर होती हैं।

यह सब इसलिए होता है कि हम बचपन से बेटों और बेटियों में फर्क करते हैं.... बेटियां घर का काम करेंगी, बेटे बाहर का काम करेंगे... बचपन से सिखाया जाता है कि खाना बनाना केवल बेटियों को सीखना चाहिए... सारे संस्कार केवल बेटियों को ही सिखाये जाते हैं, कैसे चलना है, कैसे बैठना है, कैसे बोलना है, इत्यादि।  जिन्हें शुरू से ही निरंकुश बनाया गया है, वह बड़े होकर निरंकुशता ही फैलाएंगे.

अगर हम बदलाव लाना चाहते है तो शुरुआत हमें अपने से और अपनों से ही करनी होगी। वर्ना करने के लिए तो कितनी ही बातें हैं... यूँ ही करते रहेंगे और होगा कुछ भी नहीं...
आपकी राय:

17 comments:

  1. बिलकुल सही कहा इस बात की शुरूआत अपने घर से ही करनी चाहिए , बेटो को शुरू से बताना चाहिए की उन्हें लड़कियों को न केवल बराबरी का समझाना चाहिए बल्कि हर स्त्री का सम्मान करना चाहिए चाहे वो आप के पहचान की हो या न हो , क्योकि कई बार हम घर की महिलाओ को सम्मान करने की बात तो सिखाते है किन्तु बाहर की महिलाओ की नहीं , दुसरे की यदि अन्य कोई भी बुरा व्यवहार करे तो मामला दूसरो का है कह आगे न निकल जाये बल्कि अपने स्तर पर उसका विरोध करे ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. बिलकुल सही कहा अंशुमाला जी... दुर्व्यवहार तो दुर्व्यवहार है, चाहे अपनों से हो या दूसरों से... और फिर जो दूसरों से दुर्व्यवहार करता है वह एक ना एक दिन अपनों से भी वैसा ही घटिया व्यवहार अवश्य करता है...

      Delete
  2. है तो यही ज़रूरी,परन्तु !- यह दुखद फर्क आये दिन देखने को मिलता है . मेरे यहाँ ऐसा नहीं होता,मैं ऐसा नहीं करती से परिवर्तन नहीं होता ... बूंद बूंद से घट भरता है कहते हैं,पर इन बूंदों में कोसों दूरी है

    ReplyDelete
    Replies
    1. बिलकुल सही कहा रश्मि प्रभा जी... मैं तो हमेशा कहता हूँ, बदलाव लाना है तो दूसरों पर ऊँगली उठाने की जगह अपने से और अपनों से ही शुरुआत करनी होगी...

      Delete
  3. आपकी बात से पूरी तरह से सहमत घर से ही बच्चों में इस फर्क को कम करने का काम करना चाहिए और ये काम माँ से बेहतर कोई नहीं कर सकती उसे दोनों पक्षों की बात सुनकर फैसला लेना चाहिए न की बेटे की तरफदारी करनी चाहिए बहुत अच्छे विषय पर चर्चा में आपकी बात से सहमत |

    ReplyDelete
    Replies
    1. बिलकुल, अगर घर संभालने का ज़िम्मा माँ पर है तो उसको अधिक मेहनत करनी पड़ेगी. लेकिन ज़िम्मेदारी तो दोनों की है और इसे दोनों को समझना पड़ेगा...

      Delete
  4. शहरों में यह बदलाव आ चुका है .
    गावों में आना बाकि है .

    ReplyDelete
    Replies
    1. बिलकुल, बदलाव तो आ रहा है... लेकिन अभी तक यह अधिकतर दिखावे तक ही सिमित है. स्थिति तो सतही तौर पर पूरी तरह बदलाव लाने से आएगा... चाहे गांव हों या शहर...

      Delete
  5. Replies
    1. That's why this blog title is "छोटी बात". I've started this blog only for micro-blogging, even that time Facebook was not in fashion... :-)

      Delete
    2. चलिए थोडा सा और लिख दिया है, पर इस विषय पर लिखने को इतना कुछ है, इसलिए समय मिलते ही विस्तार से ब्लॉग 'प्रेमरस' पर लिखूंगा..

      Delete
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (13-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद शास्त्री जी... आप कितनी मेहनत करते हैं!

      Delete
  7. बढ़िया विचार

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया वंदना जी. अगर हम अच्छे विचारों को अपने संस्कारों में ढाल पाएं, तभी कुछ फायदा है...

      Delete
  8. शाह नवाज जी ने मेरे मन की बात कही... समाज में बदलाव लाना है तो हमें बचपन की नीव ठीक करनी होगी.... बच्चों के साथ बिलकुल बारबर का व्यवहार ..और च्छे संस्कार दोनों को ... ताकि एक सुन्दर और सुरक्षित समाज का सृजन हो सके ... सादर

    ReplyDelete
    Replies
    1. बिलकुल सही नूतन जी... बचपन की नींव ठीक होने से काफी हद तक फर्क पड़ेगा... हालाँकि इसके उपरांत शिक्षा पद्धति में भी बदलाव की आवश्यकता पड़ेगी.

      Delete