जामा मस्जिद का इमाम कोई बुखारी ही क्यों?

आखिर जामा मस्जिद में इमाम की नियुक्ति में परिवारवाद क्यों चलता आ रहा है? जबकि यह इस्लाम का तरीका भी नहीं है.

किसी भी मस्जिद के इमाम को नियुक्त करने की ज़िम्मेदारी वहां की कमेटी की होती है, इस्लाम में मस्जिद की इमामत तो क्या मुल्क की देखभाल करने (जिसे आप राज करना भी कह सकते हैं) जैसे महत्वपूर्ण कामों में भी पारिवारिक दखल की कोई गुंजाइश नहीं होती, बल्कि यह निर्णय काबिलियत के एतबार से होता है. फिर आखिर कोई बुखारी परिवार का सदस्य ही क्यों जामा मस्जिद की इमामत संभालता हैं? हैरत की बात है की कहीं कोई विरोध भी नहीं है?
आपकी राय:

4 comments:

  1. कल "हक बात" पर शीबा असलम की मेल पढी थी। खैर
    हर क्षेत्र में परिवारवाद की बजाय काबिलियत को ही तवज्जो दी जानी चाहिये।

    प्रणाम

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  2. भाई जी सब अल्लाह की मर्जी है क्या आप क्या मैं

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  3. अल्लाह की मर्जी है :) हा हा हा , कुदरत के करिश्मे है ,

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