इश्क़ की मंजिल



इश्क़ की मंजिल

महबूब नींद, माशूक ख़्वाब और इश्क़ रात की तरह है।
जिस तरह रात में नींद और ख़्वाब का मिलन अक्सर होता है,
उसी तरह आशिक़ और माशूक़ का मिलन भी रातनुमा इश्क़ में होता है।

मगर यह ज़रूरी नहीं कि हर रात की नींद में ख़्वाब आए!
इसी तरह आशिक़ों का मिलन भी हर इक की किस्मत मैं नहीं होता।



- शाहनवाज़ सिद्दीकी 'साहिल'
आपकी राय:

12 comments:

  1. Bahut hi khoobsurat baat shahji

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  2. Bahut hi khoobsurat baat shahji

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  3. Bahut hi khoobsurat baat shahji

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  4. ब्लागर की तक़दीर ज़माने से उलट होती है । जगता है ब्लागर जब दुनिया सोती है ॥ दिन में ही हक ए माशूक़ यूँ अदा करता है । ताकता है ऊपर कि ज़मीं आसमान होती है ॥

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  5. इस अमल का नाम है - वस्ल ए माशूक़ बशक्ल ए माकूस । किसी ने आज़माया हो तो बताओ ?

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  6. वस्ल ए माशूक़ बशक्ल ए माकूस..... Kya baat hai anwar ji............

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  7. Alag andaaz...sochne ka bhi aur kehne ka bhi...

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  8. YU TOH TAMANNAO KI TASVEER HAR KOI SAJATA H...PAR PATA WAHI H JO TAQDEER SATH LATA H....

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